संदेश

जयशंकर प्रसाद लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

आह ! वेदना मिली विदाई

आह ! वेदना मिली विदाई मैंने भ्रमवश जीवन संचित, मधुकरियों की भीख लुटाई छलछल थे संध्या के श्रमकण आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण मेरी यात्रा पर लेती थी नीरवता अनंत अँगड़ाई श्रमित स्वप्न की मधुमाया में गहन-विपिन की तरु छाया में पथिक उनींदी श्रुति में किसने यह विहाग की तान उठाई लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी रही बचाए फिरती कब की मेरी आशा आह ! बावली तूने खो दी सकल कमाई चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर प्रलय चल रहा अपने पथ पर मैंने निज दुर्बल पद-बल पर उससे हारी-होड़ लगाई लौटा लो यह अपनी थाती मेरी करुणा हा-हा खाती विश्व ! न सँभलेगी यह मुझसे इसने मन की लाज गँवाई - जयशंकर प्रसाद

लहर

वे कुछ दिन कितने सुंदर थे ? जब सावन घन सघन बरसते इन आँखों की छाया भर थे सुरधनु रंजित नवजलधर से- भरे क्षितिज व्यापी अंबर से मिले चूमते जब सरिता के हरित कूल युग मधुर अधर थे प्राण पपीहे के स्वर वाली बरस रही थी जब हरियाली रस जलकन मालती मुकुल से जो मदमाते गंध विधुर थे चित्र खींचती थी जब चपला नील मेघ पट पर वह विरला मेरी जीवन स्मृति के जिसमें खिल उठते वे रूप मधुर थे - जयशंकर प्रसाद

कामायनी[चिंता:भाग २]

सुरा सुरभिमय बदन अरूण वे नयन भरे आलस अनुराग़, कल कपोल था जहाँ बिछलता कल्पवृक्ष का पीत पराग। विकल वासना के प्रतिनिधि वे सब मुरझाये चले गये, आह जले अपनी ज्वाला से फिर वे जल में गले, गये।" "अरी उपेक्षा-भरी अमरते री अतृप्ति निबार्ध विलास द्विधा-रहित अपलक नयनों की भूख-भरी दर्शन की प्यास बिछुडे तेरे सब आलिंगन, पुलक-स्पर्श का पता नहीं, मधुमय चुंबन कातरतायें, आज न मुख को सता रहीं। रत्न-सौंध के वातायन, जिनमें आता मधु-मदिर समीर, टकराती होगी अब उनमें तिमिगिलों की भीड अधीर। देवकामिनी के नयनों से जहाँ नील नलिनों की सृष्टि होती थी, अब वहाँ हो रही प्रलयकारिणी भीषण वृष्टि। वे अम्लान-कुसुम-सुरभित-मणि रचित मनोहर मालायें, बनीं श्रृंखला, जकड़ी जिनमें विलासिनी सुर-बालायें। देव-यजन के पशुयज्ञों की वह पूर्णाहुति की ज्वाला, जलनिधि में बन जलती कैसी आज लहरियों की माला।" "उनको देख कौन रोया यों अंतरिक्ष में बैठ अधीर व्यस्त बरसने लगा अश्रुमय यह प्रालेय हलाहल नीर हाहाकार हुआ क्रंदनमय कठिन कुलिश होते थे चूर, हुए दिगंत बधिर, भीषण रव बार-बार होता था क्रूर। दिग्दाहों से धूम उठे, या जलचर उठे क्षितिज-...

कामायनी[चिंता:भाग १]

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह एक पुरुष, भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह | नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन, एक तत्व की ही प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतन | दूर दूर तक विस्तृत था हिम स्तब्ध उसी के हृदय समान. नीरवता सी शिला चरण से टकराता फिरता पवमान | तरूण तपस्वी-सा बैठा साधन करता सुर-स्मशान, नीचे प्रलय लहरों का होता था सकरूण अवसान। उसी तपस्वी-से लंबे थे देवदारू दो चार खड़े, हुए हिम-धवल, जैसे पत्थर बनकर ठिठुरे रहे अड़े। अवयव की दृढ मांस-पेशियाँ, ऊर्जस्वित था वीर्य्य अपार, स्फीत शिरायें, स्वस्थ रक्त का होता था जिनमें संचार। चिता-कातर वदन हो रहा पौरष जिसमें ओत-प्रोत, उधर उपेक्षामय यौवनव का बहता भीतर मधुमय स्रोत। बँधी महावट से नौका थी सूखे में अब पड़ी रही, उतर चला था वह जल प्लावन, और निकलने लगी मही। निकल रही थी मर्म वेदना करूणा विकल कहानी सी, वहाँ अकेली प्रकृति सुन रही, हँसती-सी पहचानी-सी। "ओ चिता की पहली रेखा, अरी विश्व-वन की व्याली, ज्वालामुखी स्फोट के भीषण प्रथम कंप-सी मतवाली। हे अभाव की चपल बालिके, री ललाट की खलखेला हरी-भरी-सी दौड-धूप, ओ जल-माया क...