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एक कहानी

प्रस्तुत कविता http://merekavimitra.blogspot.com से ली गयी है। इस कविता ने 'हिन्द-युग्म यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता' मे प्रथम स्थान प्राप्त किया। अधिक जानकारी के लिये यहाँ click करें । उसको देखा जब भी, जिस क्षण, कृश तन , विदग्ध सा अंतर्मन; ले तड़प-तड़पकर जीता है, अपमान - हलाहल पीता है। पूछा मैनें , रे चिर- बेकल, कृश यह काया,ये नैन सजल; तू किसपर क्रोधित है भाई, जो इतनी खामोशी पाई? तू कृषक, अन्न उपजाता है, फ़िर क्यों भूखा रह जाता है? इतना उत्ताप भला कोई , किस तरह सहन कर पाता है? लख तेरी हालत, रह न सका; कुछ कहना चाहा, कह न सका। पर साहस आज जुटा पाया, जिज्ञासावश होकर आया; दे मेरे प्रश्नों का उत्तर , तज लाज़-हया का तम दुस्तर। फ़िर उसने मुझे बताया था, किस तरह कहूँ, सुन पाया था? बोला- भाई , तुम जान रहे, दुखियारा मैं , पहचान रहे। मैं भी तो जीवन जीता था, सुख से कुछ जीवन बीता था; सब यहाँ चैन से रहते थे, सुख - दुःख बाँटकर सह्ते थे। पर समय कभी क्या एक रहा? दुःख - सुख में तो हर एक रहा। मानव बस एक निशाना है, दोनों का आना जाना है। निज गृह पर विपदा आई थी, अपने संगी भी लाई थी। वह रात पड़ी मुझप...