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ये ज़िंदगी

ये ज़िन्दगी आज जो तुम्हारे बदन की छोटी-बड़ी नसों में मचल रही है तुम्हारे पैरों से चल रही है तुम्हारी आवाज़ में ग़ले से निकल रही है तुम्हारे लफ़्ज़ों में ढल रही है ये ज़िन्दगी जाने कितनी सदियों से यूँ ही शक्लें बदल रही है बदलती शक्लों बदलते जिस्मों में चलता-फिरता ये इक शरारा जो इस घड़ी नाम है तुम्हारा इसी से सारी चहल-पहल है इसी से रोशन है हर नज़ारा सितारे तोड़ो या घर बसाओ क़लम उठाओ या सर झुकाओ तुम्हारी आँखों की रोशनी तक है खेल सारा ये खेल होगा नहीं दुबारा ये खेल होगा नहीं दुबारा - निदा फ़ाज़ली
तुम्हारी कब्र पर मैं फ़ातेहा पढ़ने नही आया, मुझे मालूम था, तुम मर नही सकते तुम्हारी मौत की सच्ची खबर जिसने उड़ाई थी, वो झूठा था, वो तुम कब थे? कोई सूखा हुआ पत्ता, हवा मे गिर के टूटा था । मेरी आँखे तुम्हारी मंज़रो मे कैद है अब तक मैं जो भी देखता हूँ, सोचता हूँ वो, वही है जो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थी । कहीं कुछ भी नहीं बदला, तुम्हारे हाथ मेरी उंगलियों में सांस लेते हैं, मैं लिखने के लिये जब भी कागज कलम उठाता हूं, तुम्हे बैठा हुआ मैं अपनी कुर्सी में पाता हूं | बदन में मेरे जितना भी लहू है, वो तुम्हारी लगजिशों नाकामियों के साथ बहता है, मेरी आवाज में छुपकर तुम्हारा जेहन रहता है, मेरी बीमारियों में तुम मेरी लाचारियों में तुम | तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है, वो झूठा है, वो झूठा है, वो झूठा है, तुम्हारी कब्र में मैं दफन तुम मुझमें जिन्दा हो, कभी फुरसत मिले तो फातहा पढनें चले आना | -निदा फ़ालजी " नीरज रोहिला " जी का बहुत बहुत धन्यवाद इस कृति को पूरा करने के लिये ।
मस्जिदों-मन्दिरों की दुनिया में मुझको पहचानते कहाँ हैं लोग रोज़ मैं चाँद बन के आता हूँ दिन में सूरज सा जगमगाता हूँ खनखनाता हूँ माँ के गहनों में हँसता रहता हूँ छुप के बहनों में मैं ही मज़दूर के पसीने में मैं ही बरसात के महीने में मेरी तस्वीर आँख का आँसू मेरी तहरीर जिस्म का जादू मस्जिदों-मन्दिरों की दुनिया में मुझको पहचानते नहीं जब लोग मैं ज़मीनों को बे-ज़िया करके आसमानों में लौट जाता हूँ मैं ख़ुदा बन के क़हर ढाता हूँ -निदा फ़ाज़ली