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मनुष्यता

विचार लो कि मत्र्य हो न मृत्यु से डरो कभी¸ मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी। हुई न यों सु–मृत्यु तो वृथा मरे¸ वृथा जिये¸ नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए। यही पशु–प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे¸ वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।। उसी उदार की कथा सरस्वती बखानवी¸ उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती। उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती; तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती। अखण्ड आत्मभाव जो असीम विश्व में भरे¸ वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिये मरे।। सहानुभूति चाहिए¸ महाविभूति है वही; वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही। विरूद्धवाद बुद्ध का दया–प्रवाह में बहा¸ विनीत लोक वर्ग क्या न सामने झुका रहे? अहा! वही उदार है परोपकार जो करे¸ वहीं मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।। अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े¸ समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े–बड़े। परस्परावलम्ब से उठो तथा बढ़ो सभी¸ अभी अमत्र्य–अंक में अपंक हो चढ़ो सभी। रहो न यों कि एक से न काम और का सरे¸ वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।। "मनुष्य मात्र बन्धु है" यही बड़ा विवेक है¸ पुराणपुरूष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है। फलानुसार...
दोनों ओर प्रेम पलता है सखि पतंग भी जलता है हा दीपक भी जलता है सीस हिलाकर दीपक कहता बन्धु वृथा ही तू क्यों दहता पर पतंग पडकर ही रहता कितनी विह्वलता है दोनों ओर प्रेम पलता है बचकर हाय पतंग मरे क्या प्रणय छोडकर प्राण धरे क्या जले नही तो मरा करें क्या, क्या यह असफलता है दोनों ओर प्रेम पलता है कहता है पतंग मन मारे तुम महान मैं लघु पर प्यारे क्या न मरण भी हाथ हमारे, शरण किसे छलता है दोनों ओर प्रेम पलता है दीपक के जलनें में आली फिर भी है जीवन की लाली किन्तु पतंग भाग्य लिपि काली, किसका वश चलता है दोनों ओर प्रेम पलता है जगती वणिग्वृत्ति है रखती उसे चाहती जिससे चखती काम नही परिणाम निरखती, मुझको ही खलता है दोनों ओर प्रेम पलता है -मैथिलीशरण गुप्त