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क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं?

अगणित उन्मादों के क्षण हैं, अगणित अवसादों के क्षण हैं, रजनी की सूनी की घडियों को किन-किन से आबाद करूं मैं! क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं! याद सुखों की आसूं लाती, दुख की, दिल भारी कर जाती, दोष किसे दूं जब अपने से, अपने दिन बर्बाद करूं मैं! क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं! दोनो करके पछताता हूं, सोच नहीं, पर मैं पाता हूं, सुधियों के बंधन से कैसे अपने को आबाद करूं मैं! क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं! - हरिवंश राय बच्चन

साथी, सब कुछ सहना होगा!

मानव पर जगती का शासन, जगती पर संसृति का बंधन, संसृति को भी और किसी के प्रतिबंधो में रहना होगा! साथी, सब कुछ सहना होगा! हम क्या हैं जगती के सर में! जगती क्या, संसृति सागर में! कि प्रबल धारा में हमको लघु तिनके-सा बहना होगा! साथी, सब कुछ सहना होगा! आ‌ओ, अपनी लघुता जानें, अपनी निर्बलता पहचानें, जैसे जग रहता आया है उसी तरह से रहना होगा! साथी, सब कुछ सहना होगा! - हरिवंशराय बच्चन

क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर, पलक संपुटों में मदिरा भर, तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था? क्षण भर को क्यों प्यार किया था? ‘यह अधिकार कहाँ से लाया!’ और न कुछ मैं कहने पाया - मेरे अधरों पर निज अधरों का तुमने रख भार दिया था! क्षण भर को क्यों प्यार किया था? वह क्षण अमर हुआ जीवन में, आज राग जो उठता मन में - यह प्रतिध्वनि उसकी जो उर में तुमने भर उद्गार दिया था! क्षण भर को क्यों प्यार किया था? - हरिवंश राय बच्चन

अंधेरे का दीपक

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है बादलों के अश्रु से धोया गया नभ-नील नीलम का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम प्रथम ऊषा की किरण की लालिमा-सी लाल मदिरा थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनों हथेली एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है क्या घड़ी थी, एक भी चिंता नहीं थी पास आई कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई आँख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई वह गई तो ले गई उल्लास के आधार, माना पर अथिरता पर समय की मुसकराना कब मना है है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिनमें राग जागा वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा एक अंतर से ध्वनित हों दूसरे में जो...
और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ। क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं? बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जो रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने। रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने। फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में और चारों ओर दुनिया सो रही थी। तारिकाऐं ही गगन की जानती हैं जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी। मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे अधजगा सा और अधसोया हुआ सा। रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने। एक बिजली छू गई सहसा जगा मैं कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में। इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसू बह रहे थे इस नयन से उस नयन में। मैं लगा दूँ आग इस संसार में है प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर। जानती हो उस समय क्या कर गुज़रने के लिए था कर दिया तैयार तुमने! रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने। प्रात ही की ओर को है रात चलती औ उजाले में अंधेरा डूब जाता। मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी खूबियों के साथ परदे को उठाता। एक चेहरा सा लगा तुमने लिया था और मैंने था उतारा एक चेहरा। वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने पर ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने। रात आधी खीं...

प्रतीक्षा

मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता ? मौन रात इस भाँति कि जैसे, को‌ई गत वीणा पर बज कर, अभी-अभी सो‌ई खो‌ई-सी सपनों में तारों पर सिर धर और दिशा‌ओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं, कान तुम्हारी तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता ? तुमने कब दी बात रात के सूने में तुम आनेवाले, पर ऐसे ही वक्त प्राण मन, मेरे हो उठते मतवाले, साँसें घूम-घूम फिर - फिर से, असमंजस के क्षण गिनती हैं, मिलने की घड़ियाँ तुम निश्चित, यदि कर जाते तब क्या होता ? उत्सुकता की अकुलाहट में, मैंने पलक पाँवड़े डाले, अम्बर तो मशहूर कि सब दिन, रहता अपना होश सम्हाले, तारों की महफ़िल ने अपनी आँख बिछा दी किस आशा से, मेरे मौन कुटी को आते तुम दिख जाते तब क्या होता ? बैठ कल्पना करता हूँ, पगचाप तुम्हारी मग से आती रग-रग में चेतनता घुलकर, आँसु के कण-सी झर जाती, नमक डली-सा गल अपनापन, सागर में घुलमिल-सा जाता, अपनी बाहों में भरकर प्रिय, कण्ठ लगाते तब क्या होता ? -हरिवंश राय बच्चन

कोशिश

यह कविता मेरे मन पसंदीदा कविताओं मे से एक है । लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है, चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है। मन का विश्वास रगों में साहस भरता है, चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है। आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है, जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है। मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में, बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में। मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो, क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो। जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम, संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम। कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। -हरिवंशराय बच्चन
मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता ? मौन रात इस भाँति कि जैसे, को‌ई गत वीणा पर बज कर, अभी-अभी सो‌ई खो‌ई-सी सपनों में तारों पर सिर धर और दिशा‌ओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं, कान तुम्हारी तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता ? तुमने कब दी बात रात के सूने में तुम आनेवाले, पर ऐसे ही वक्त प्राण मन, मेरे हो उठते मतवाले, साँसें घूम-घूम फिर - फिर से, असमंजस के क्षण गिनती हैं, मिलने की घड़ियाँ तुम निश्चित, यदि कर जाते तब क्या होता ? उत्सुकता की अकुलाहट में, मैंने पलक पाँवड़े डाले, अम्बर तो मशहूर कि सब दिन, रहता अपना होश सम्हाले, तारों की महफ़िल ने अपनी आँख बिछा दी किस आशा से, मेरे मौन कुटी को आते तुम दिख जाते तब क्या होता ? बैठ कल्पना करता हूँ, पगचाप तुम्हारी मग से आती रग-रग में चेतनता घुलकर, आँसु के कण-सी झर जाती, नमक डली-सा गल अपनापन, सागर में घुलमिल-सा जाता, अपनी बाहों में भरकर प्रिय, कण्ठ लगाते तब क्या होता ? -हरिवंश राय बच्चन

मुझे पुकार लो

इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो! ज़मीन है न बोलती न आसमान बोलता, जहान देखकर मुझे नहीं जबान खोलता, नहीं जगह कहीं जहाँ न अजनबी गिना गया, कहाँ-कहाँ न फिर चुका दिमाग-दिल टटोलता, कहाँ मनुष्य है कि जो उमीद छोड़कर जिया, इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो! तिमिर-समुद्र कर सकी न पार नेत्र की तरी, विनष्ट स्वप्न से लदी, विषाद याद से भरी, न कूल भूमि का मिला, न कोर भोर की मिली, न कट सकी, न घट सकी विरह-घिरी विभावरी, कहाँ मनुष्य है जिसे कमी खली न प्यार की, इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे दुलार लो! इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो! उजाड़ से लगा चुका उमीद मैं बहार की, निदघ से उमीद की बसंत के बयार की, मरुस्थली मरीचिका सुधामयी मुझे लगी, अंगार से लगा चुका उमीद मै तुषार की, कहाँ मनुष्य है जिसे न भूल शूल-सी गड़ी इसीलिए खड़ा रहा कि भूल तुम सुधार लो! इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो! पुकार कर दुलार लो, दुलार कर सुधार लो! -हरिवंश राय बच्चन