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आह को चाहिये

आह को चाहिये एक उम्र असर होने तक, कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ के सर होने तक आशिक़ी सब्र तलब और तमन्ना बेताब दिल का क्या रंज करूं खूने जिगर होने तक हमने माना कि तगाफुल ना करोगे लेकिन, ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक परतव-ए-खुर से है शबनम को फना की तालीम मैं भी हूँ एक इनायत कि नज़र होने तक गम-ए-हस्ती का असद किससे हो जुज़ मर्ग इलाज शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक - मिर्ज़ा गालिब
दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है आखिर इस दर्द कि दवा क्या है हम है मुश्ताक और वो बेज़ार [मुश्ताक( interested) = दिलचस्पी लेने वाला] [बेज़ार( sick of) = उदास,बीमार] या ईलाही! ये माजरा क्या है हम भी मुहँ मे जबान रखते हैं काश पूछो कि मुद्दा क्या है जब की तुझ बिन नही कोई मौजूद फिर ये हंगामा ऐ खुदा क्या है ये परी-चेहरा लोग कैसे है गमज़ा-ओ-इश्वा-ओ-अदा क्या है -मिर्जा गालिब