आदमी बुलबुला है पानी का, और पानी की बहती सतह पर, टूटता भी है, और डूबता भी है, फिर उभरता है, फिर से बहता है, न समंदर निगल सका इसको, वक्त की मौज पर सदा बहता; आदमी बुलबुला है पानी का! -गुलज़ार
सबसे पहले मेरे घर का, अण्डे जैसा था आकार, तब मैं यही समझती थी बस, इतना सा ही है संसार । फिर मेरा घर बना घोसला, सूखे तिनको से तैयार, तब मैं यही समझती बस, इतना सा ही है संसार । फिर मैं निकल गयी साखों पर, हरी भरी थी जो सुकुमार, तब मैं यही समझती बस, इतना सा ही है संसार । आखिर जब में आसमान में, उड़ी दूर तक पंख पसार, तभी समझ में मेरी आया, बहुत बड़ा है यह संसार ! - अनजान
दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है आखिर इस दर्द कि दवा क्या है हम है मुश्ताक और वो बेज़ार [मुश्ताक( interested) = दिलचस्पी लेने वाला] [बेज़ार( sick of) = उदास,बीमार] या ईलाही! ये माजरा क्या है हम भी मुहँ मे जबान रखते हैं काश पूछो कि मुद्दा क्या है जब की तुझ बिन नही कोई मौजूद फिर ये हंगामा ऐ खुदा क्या है ये परी-चेहरा लोग कैसे है गमज़ा-ओ-इश्वा-ओ-अदा क्या है -मिर्जा गालिब
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