हम ने माना के तगाफ़ुल ना करोगे, लेकिन
खाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक
- मिर्जा गालिब
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मरा हूँ हजार मरण पाई तब चरण-शरण।
फैला जो तिमिर जाल कट-कटकर रहा काल, आँसुओं के अंशुमाल, पड़े अमित सिताभरण।
जल-कलकल-नाद बढ़ा अन्तर्हित हर्ष कढ़ा, विश्व उसी को उमड़ा, हुए चारु-करण सरण।
-सूर्यकांतत्रिपाठी 'निराला'
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दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है आखिर इस दर्द कि दवा क्या है हम है मुश्ताक और वो बेज़ार [मुश्ताक( interested) = दिलचस्पी लेने वाला] [बेज़ार( sick of) = उदास,बीमार] या ईलाही! ये माजरा क्या है हम भी मुहँ मे जबान रखते हैं काश पूछो कि मुद्दा क्या है जब की तुझ बिन नही कोई मौजूद फिर ये हंगामा ऐ खुदा क्या है ये परी-चेहरा लोग कैसे है गमज़ा-ओ-इश्वा-ओ-अदा क्या है -मिर्जा गालिब
कहीं जाना नहीं है बस यूँ ही सड़कों पे घूमेंगे कहीं पर तोड़ेंगे सिगनल किसी की राह रोकेंगे कोई चिल्ला के गाली देगा कोई 'होर्न' बजायेगा! ज़रा एहसास तो होगा कि ज़िन्दा हैं हमारी कोई हस्ती है !! -- गुलज़ार
सबसे पहले मेरे घर का, अण्डे जैसा था आकार, तब मैं यही समझती थी बस, इतना सा ही है संसार । फिर मेरा घर बना घोसला, सूखे तिनको से तैयार, तब मैं यही समझती बस, इतना सा ही है संसार । फिर मैं निकल गयी साखों पर, हरी भरी थी जो सुकुमार, तब मैं यही समझती बस, इतना सा ही है संसार । आखिर जब में आसमान में, उड़ी दूर तक पंख पसार, तभी समझ में मेरी आया, बहुत बड़ा है यह संसार ! - अनजान
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