संदेश

अंधेरे का दीपक

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है बादलों के अश्रु से धोया गया नभ-नील नीलम का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम प्रथम ऊषा की किरण की लालिमा-सी लाल मदिरा थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनों हथेली एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है क्या घड़ी थी, एक भी चिंता नहीं थी पास आई कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई आँख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई वह गई तो ले गई उल्लास के आधार, माना पर अथिरता पर समय की मुसकराना कब मना है है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिनमें राग जागा वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा एक अंतर से ध्वनित हों दूसरे में जो...
तुम्हारी कब्र पर मैं फ़ातेहा पढ़ने नही आया, मुझे मालूम था, तुम मर नही सकते तुम्हारी मौत की सच्ची खबर जिसने उड़ाई थी, वो झूठा था, वो तुम कब थे? कोई सूखा हुआ पत्ता, हवा मे गिर के टूटा था । मेरी आँखे तुम्हारी मंज़रो मे कैद है अब तक मैं जो भी देखता हूँ, सोचता हूँ वो, वही है जो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थी । कहीं कुछ भी नहीं बदला, तुम्हारे हाथ मेरी उंगलियों में सांस लेते हैं, मैं लिखने के लिये जब भी कागज कलम उठाता हूं, तुम्हे बैठा हुआ मैं अपनी कुर्सी में पाता हूं | बदन में मेरे जितना भी लहू है, वो तुम्हारी लगजिशों नाकामियों के साथ बहता है, मेरी आवाज में छुपकर तुम्हारा जेहन रहता है, मेरी बीमारियों में तुम मेरी लाचारियों में तुम | तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है, वो झूठा है, वो झूठा है, वो झूठा है, तुम्हारी कब्र में मैं दफन तुम मुझमें जिन्दा हो, कभी फुरसत मिले तो फातहा पढनें चले आना | -निदा फ़ालजी " नीरज रोहिला " जी का बहुत बहुत धन्यवाद इस कृति को पूरा करने के लिये ।

पुनः नया निर्माण करो

उठो धरा के अमर सपूतो पुनः नया निर्माण करो । जन-जन के जीवन में फिर से नई स्फूर्ति, नव प्राण भरो । नया प्रात है, नई बात है, नई किरण है, ज्योति नई । नई उमंगें, नई तरंगे, नई आस है, साँस नई । युग-युग के मुरझे सुमनों में, नई-नई मुसकान भरो । डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ नए स्वरों में गाते हैं । गुन-गुन, गुन-गुन करते भौंरे मस्त हुए मँडराते हैं । नवयुग की नूतन वीणा में नया राग, नवगान भरो । कली-कली खिल रही इधर वह फूल-फूल मुस्काया है । धरती माँ की आज हो रही नई सुनहरी काया है । नूतन मंगलमयी ध्वनियों से गुँजित जग-उद्यान करो । सरस्वती का पावन मंदिर यह संपत्ति तुम्हारी है । तुम में से हर बालक इसका रक्षक और पुजारी है । शत-शत दीपक जला ज्ञान के नवयुग का आव्हान करो । उठो धरा के अमर सपूतो, पुनः नया निर्माण करो । -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
चाँद मद्धम है, आसमाँ चुप है नीद की गोद मे जहाँ चुप है दूर वादी में दुधीया बादल झुक के परबत को प्यार करते हैं दिल मे नाकाम हसरते लेकर हम तेरा इन्तेजार करते हैं इन बहारो के साये मे आ जा फिर मोहब्बत जवां रहे ना रहे ज़िन्दगी तेरे ना-मूरादों पर कल तक मेहरबान रहे ना रहे रोज की तरह आज भी तारे सुबह की गर्द मे ना खो जायें आ! तेरे गम मे जागती आँखे कम से कम एक रात सो जाये चाँद मद्धम है, आसमाँ चुप है नीद की गोद मे जहाँ चुप है -साहिर लुधिआनवी
और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ। क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं? बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जो रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने। रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने। फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में और चारों ओर दुनिया सो रही थी। तारिकाऐं ही गगन की जानती हैं जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी। मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे अधजगा सा और अधसोया हुआ सा। रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने। एक बिजली छू गई सहसा जगा मैं कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में। इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसू बह रहे थे इस नयन से उस नयन में। मैं लगा दूँ आग इस संसार में है प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर। जानती हो उस समय क्या कर गुज़रने के लिए था कर दिया तैयार तुमने! रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने। प्रात ही की ओर को है रात चलती औ उजाले में अंधेरा डूब जाता। मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी खूबियों के साथ परदे को उठाता। एक चेहरा सा लगा तुमने लिया था और मैंने था उतारा एक चेहरा। वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने पर ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने। रात आधी खीं...

शक्ति और क्षमा

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल सबका लिया सहारा पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे कहो, कहाँ कब हारा ? क्षमाशील हो रिपु-समक्ष तुम हुये विनीत जितना ही दुष्ट कौरवों ने तुमको कायर समझा उतना ही। अत्याचार सहन करने का कुफल यही होता है पौरुष का आतंक मनुज कोमल होकर खोता है। क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो उसको क्या जो दंतहीन विषरहित, विनीत, सरल हो । तीन दिवस तक पंथ मांगते रघुपति सिन्धु किनारे, बैठे पढ़ते रहे छन्द अनुनय के प्यारे-प्यारे । उत्तर में जब एक नाद भी उठा नहीं सागर से उठी अधीर धधक पौरुष की आग राम के शर से । सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि करता आ गिरा शरण में चरण पूज दासता ग्रहण की बँधा मूढ़ बन्धन में। सच पूछो , तो शर में ही बसती है दीप्ति विनय की सन्धि-वचन संपूज्य उसी का जिसमें शक्ति विजय की । सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है। - रामधारी सिंह दिनकर
मस्जिदों-मन्दिरों की दुनिया में मुझको पहचानते कहाँ हैं लोग रोज़ मैं चाँद बन के आता हूँ दिन में सूरज सा जगमगाता हूँ खनखनाता हूँ माँ के गहनों में हँसता रहता हूँ छुप के बहनों में मैं ही मज़दूर के पसीने में मैं ही बरसात के महीने में मेरी तस्वीर आँख का आँसू मेरी तहरीर जिस्म का जादू मस्जिदों-मन्दिरों की दुनिया में मुझको पहचानते नहीं जब लोग मैं ज़मीनों को बे-ज़िया करके आसमानों में लौट जाता हूँ मैं ख़ुदा बन के क़हर ढाता हूँ -निदा फ़ाज़ली
दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है आखिर इस दर्द कि दवा क्या है हम है मुश्ताक और वो बेज़ार [मुश्ताक( interested) = दिलचस्पी लेने वाला] [बेज़ार( sick of) = उदास,बीमार] या ईलाही! ये माजरा क्या है हम भी मुहँ मे जबान रखते हैं काश पूछो कि मुद्दा क्या है जब की तुझ बिन नही कोई मौजूद फिर ये हंगामा ऐ खुदा क्या है ये परी-चेहरा लोग कैसे है गमज़ा-ओ-इश्वा-ओ-अदा क्या है -मिर्जा गालिब

प्रतीक्षा

मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता ? मौन रात इस भाँति कि जैसे, को‌ई गत वीणा पर बज कर, अभी-अभी सो‌ई खो‌ई-सी सपनों में तारों पर सिर धर और दिशा‌ओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं, कान तुम्हारी तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता ? तुमने कब दी बात रात के सूने में तुम आनेवाले, पर ऐसे ही वक्त प्राण मन, मेरे हो उठते मतवाले, साँसें घूम-घूम फिर - फिर से, असमंजस के क्षण गिनती हैं, मिलने की घड़ियाँ तुम निश्चित, यदि कर जाते तब क्या होता ? उत्सुकता की अकुलाहट में, मैंने पलक पाँवड़े डाले, अम्बर तो मशहूर कि सब दिन, रहता अपना होश सम्हाले, तारों की महफ़िल ने अपनी आँख बिछा दी किस आशा से, मेरे मौन कुटी को आते तुम दिख जाते तब क्या होता ? बैठ कल्पना करता हूँ, पगचाप तुम्हारी मग से आती रग-रग में चेतनता घुलकर, आँसु के कण-सी झर जाती, नमक डली-सा गल अपनापन, सागर में घुलमिल-सा जाता, अपनी बाहों में भरकर प्रिय, कण्ठ लगाते तब क्या होता ? -हरिवंश राय बच्चन

एक कहानी

प्रस्तुत कविता http://merekavimitra.blogspot.com से ली गयी है। इस कविता ने 'हिन्द-युग्म यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता' मे प्रथम स्थान प्राप्त किया। अधिक जानकारी के लिये यहाँ click करें । उसको देखा जब भी, जिस क्षण, कृश तन , विदग्ध सा अंतर्मन; ले तड़प-तड़पकर जीता है, अपमान - हलाहल पीता है। पूछा मैनें , रे चिर- बेकल, कृश यह काया,ये नैन सजल; तू किसपर क्रोधित है भाई, जो इतनी खामोशी पाई? तू कृषक, अन्न उपजाता है, फ़िर क्यों भूखा रह जाता है? इतना उत्ताप भला कोई , किस तरह सहन कर पाता है? लख तेरी हालत, रह न सका; कुछ कहना चाहा, कह न सका। पर साहस आज जुटा पाया, जिज्ञासावश होकर आया; दे मेरे प्रश्नों का उत्तर , तज लाज़-हया का तम दुस्तर। फ़िर उसने मुझे बताया था, किस तरह कहूँ, सुन पाया था? बोला- भाई , तुम जान रहे, दुखियारा मैं , पहचान रहे। मैं भी तो जीवन जीता था, सुख से कुछ जीवन बीता था; सब यहाँ चैन से रहते थे, सुख - दुःख बाँटकर सह्ते थे। पर समय कभी क्या एक रहा? दुःख - सुख में तो हर एक रहा। मानव बस एक निशाना है, दोनों का आना जाना है। निज गृह पर विपदा आई थी, अपने संगी भी लाई थी। वह रात पड़ी मुझप...